Thursday, May 14, 2020

छत्तीसगढ़ के मुंगेली से नागेश कश्यप की रचना- कइसन मानुस जाति रे

*रचनाकार का नाम:- नागेश कश्यप*
*जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)*
*शीर्षक:- कइसन मानुस जाति रे*
*विधा:- कविता*

    *कइसन मानुस जाति रे*

करनी कइसन  मनखे मन के, गिन  गिन के बताहूँ मैं।
दोगला कपटी  लबरा मन के, सबके  राज बताहूँ मैं।।
करम कुछु  नई  छोड़े मनखे, धरम के बानी बाचे बर।
दगा लबारी गोठ ल खुद के, सत् के खाँचा खाँचे बर।
पर के अंतस.......
पर के अंतस कतर कतर तुम, बाँध डारे हव घाँटी रे।
तुम कइसन मानुस जाति रे।।

धन मनखे तोर अक्कल जरगे, कइसन करनी करथस तँय।
पर के जीव ल मार मार के, पेट अपन जी भरथस तँय।।
खुद के पिरा अबड़ जनाथे, अउ पर के तन म छुरी चलाथे।।
पर सेवी बड़ ज्ञानी मनखे, खुद ल ये हर काबर बताथे।
बह रे मनखे...........
बह रे मनखे जीव ल तोर, अउ कइसन दोगला छाती रे।
तुम कइसन मानुस जाति रे।।

सत्कर्मी जेला जानेन हमन, अइसन दोगलई कर बइठे।
ढोंग धतुरा  पूजा  पाठ कर, काबर पर के गर अँइठे।।
फोकट देखावा करथे मनखे, धरम करम परतापी के।
का भरोसा करबे संगी, अइसन दोगला पापी के।।
बाना पर के...........
बाना पर के लुटे रे, इन धर धर जूझे लाठी रे।
तुम कइसन मानुस जाति रे।।

राम  रामायण  गीता  बाचे, धरम  के  रद्दा  करनी के।
थोरको  बुध ल  धर नई पाये, एको झन सत्कर्मी के।।
सबके जीव म राम बतइया, मनखे कतको मिलथे जी।
ओखरे तन म छुरी चलाके, कतर कतर पेट भरथे जी।।
जतका रट ले................
जतका रट ले काम के नई हे, कतको पोथी थाथी रे।
तुम कइसन मानुस जाति रे।।

अही धरम हे अही करम हे, आज के मानुस जाती के।
देखव देखव देखव  संगी, अइसन  करनी  पापी के।।
चोला पहिर के  रंग बदल के, राजा  साहेब बन बइठे।
मोर राज  हे  मोर  पाठ हे, कहिके  लाठी  इन अँइठे।।
करनी ले तोर...............
करनी ले तोर देखव आवव, रोवत हे मोर माटी रे।
तुम कइसन मानुस जाति रे, तुम कइसन मानुस जाति रे।।

                               नागेश कश्यप

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