Tuesday, May 19, 2020

छत्तीसगढ़ के मुंगेली से नागेश कश्यप की रचना- बनिहार

रचनाकार का नाम:- नागेश कश्यप
जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़) 
शीर्षक:- हाँ मैं बनिहार हौं
विधा:- वीर रस

हाँ मैं बनिहार हौं

     काम बूता चिन्हारी जेखर,
     जाँगर के औजार हौं।
     मेहनत मोर महतारी संगी,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

     किसान के धोती पागा मैं,
     खेत खार चिन्हार हौं।
     माटी जेखर चन्दन बरोबर,
     हा मैं बनिहार हौं।।

     गरीब के छाती ले निकले,
     भाखा के पुकार हौं।
     ऐखर तन के पसीना संगी,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

     मजदूर के रापा कुदरी भैया,
     माली के मैं हार हौं।
     निर्बल के मैं बल संगी,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

     सबके हरथौ पीरा मैं
     मैं पीरा ले अपार हौं।
     मत बाँटौं घाव मोला,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

     बैरी मन बर बैरी संगी,
     दुखियन के परिवार हौं।
     सब के मैं हितवा भैया,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

     भुइँया के छाती ले,
     सरग तक मैं सार हौं।।
     दुनिया के निर्माण म संगी,
     आघु मैं चिन्हार हौं।।
     हाँ मैं ..................,
     हाँ मैं बनिहार हौं।।

                  नागेश कश्यप।।

_______________________________

व्याख्या-
      ये रचना म एक बनिहार मनखे मजदूरी करके अपन जीवन यापन चलाने वाला, अपन उपहास उड़इया मनखे मन ल, अपन भभकत अंतस ले बतावत हे के हव मैं बनी भुति करइया जाँगर पेरइया बनिहार हरँव, मोर महिनत मोर जाँगर के बल म तुमन फरत फुलत हव अउ मोरे जिनगानी म हाँस हाँस के मोला पथरा पार डारे हव.।
   अही प्रकार जम्मो पंक्ति के भाव स्पष्टीकरण हे।

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