Saturday, May 23, 2020

छत्तीसगढ़ के मुंगेली से नागेश कश्यप की रचना- पीरा

रचनाकार का नाम:- नागेश कश्यप
जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़) 
शीर्षक:- मन के पीरा
विधा:- सरसी छंद

   मन के पीरा

कहाँ बताहूँ  कहाँ जताहूँ, मन के जी  मैं बात।
जिनगी निमगा कारी होगे, दिन हा लागे रात।।

अंतस आगी धधकत हावे, कठलत मन हा मोर।
बुड़गे जिनगी अँधियारी मा, करही कोन अँजोर।।

भइगे दिन ला काटत हँव मैं, मन ला मार समेट।
कइसन सुख  ये बैरी हर हे, कभु तो  होही भेंट।।

बिन हाँसी के हाँसे परथे, बिन मन के जी खाय।
अतका पथरा जिनगी होगे, काँही नही सुहाय।।

पीरा कतका अउ बाँचे हे, भगवन अब तो मोर?
आवव देखव कतका सुख हे, भरे दुःख घनघोर।।

 व्याख्या-
रचनाकार ये रचना के माध्यम ले अपन मन के पीरा ल उद्गार करत हे, अंतस म कतका दुःख भरे हे ओला बतावत हे, कहत हे के कहाँ जाँवव अउ कती बर जाके अपन दुःख ल काखर मेर बतावव, दुःख के मारे मोर जिनगी निमगा अँधियार होगे हे, अब दिन के उजियार घलो ह नई सुहाय.जेन ल मैं अपन जानत रहेंव ओही मोर ले तिरिया गे हे अब कोन ल मैं बतावँव, ये प्रकार ले जम्मो पंक्ति के भाव स्पष्टीकरण हे।

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