शीर्षक - - *औरत*
राज्य - - छत्तीसगढ़
मो.न. -
औरत
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माँ, बहना, भार्या,तनया
सबकी एक जात,
त्याग ,समर्पण,सेवा की
प्रतिमा कहलाती औरत जात।
सागर सा ह्रदय
धरा सी शक्ति अपार,
शौर्य की सीमा नहीं
असीमित का रूप साकार।
वेदना, संवेदना, से घिरी
प्रति क्षण आभाषित की भाषा,
ममता त्याग,सन्तोष सेवा,
हिम्मत साहस की हो परिभाषा।
आँखों में उषा की लाली
सांझ बनी काजल काली,
ना अबला,बेचारी, नादान ना लाचारी,
मैं असीमित पौरुष बल वाली।
लक्ष्मी, सावित्री, सीता,
जगपालक जगजननी हूं प्यारी,
स्वभिमान समेटे नवयुग
की भारतीय नारी।
मुझे ना रोको टोको
ना हिस्सों में बाँटो।
मैं बढूंगी, मैं पढूंगी
आसमाँ में उडूंगी
मुझे,बल दो ,सराहो ,ना
मेरे पर काटो।
माँ, बहना भार्या,तनया,
सब की एक जात,
त्याग,समर्पण, सेवा की
प्रतिमा कहलाती औरत जात।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ .ग.)
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