राज्य-दरभंगा बिहार
शीर्षक-तलाश मंजिल की
*तलाश मंजिल की*
जिन्दगी की तपती राहों पर
मीठे पानी की प्यास थी
जिन्दगी के समन्दर में
कुछ पाने की तलाश थी।
हम भटकते रहे है
खाश मंजिल पाने को
चमकते चाँद को
हथेली पर लाने की आस थी
जिन्दगी के समंदर में
कुछ पाने की तलाश थी।
कभी गिरते कभी सम्भलते
कोई राह पकड़ लिया
टूटते तारों की भी
रौशनी कुछ खाश थी
जिन्दगी के समन्दर में
कुछ पाने की तलाश थी।
कंचन प्रभा
Great poem
ReplyDeleteBahut sunder. Super se upper fantastic👌👍❤
ReplyDeleteThanku 💕⚘
Delete