छत्तीसगढ़ (भारत)
शीर्षक👇🏻👇🏻
"है कहाँ जिंदा ईमान अब"
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है कहाँ जिंदा अभिमान अब ,
है कहाँ जिंदा ईमान अब।
कदम-कदम हुई नियत खोटी,
छीन रहे हैं सबकी रोटी।
टुकड़े -टुकड़े होते रिश्ते,
काट रहे हैं बोटी -बोटी ।।
है कहाँ जिंदा इंसान अब।
है कहाँ जिंदा ईमान अब।।
मंदिर-मस्ज़िद हुए बदनाम,
शिक्षा-दीक्षा बिके सम्मान।
न्याय बिक गए खुले आम,
सज्जन हो गये अब गुमनाम।।
है कहाँ जिंदा,सत संग्राम अब,
है कहाँ जिंदा ईमान अब।
भ्र्ष्टाचार की लगती बोली,
झूठ कपूत की सारी टोली।
आदर्शों की नीलामी है।
आंदोलन पर चलती गोली।।
है कहाँ जिंदा सम्मान अब।
है कहाँ जिंदा ईमान अब।।
लोकतंत्र अब लोकजंग है,
जनगण मन सिकुड़े तंग हैं।।
अधिनायक का उड़ा रंग है।
लूट-पाट का दिखे उमंग है।।
है कहाँ जिंदा विधि-विधान अब।
है कहाँ जिंदा देश ईमान अब।
पूछने वाले कौन् हो गए,
मात-पिता भी मौन हो गए।
अस्त्र -शस्त्र परिभाषा सबकी,
छात्र स्वयं गुरु द्रोण हो गए।।
है कहाँ जिंदा मूल्य मान अब।
है कहाँ जिंदा। ईमान अब।।
पैसा -रुपया धर्म-कर्म है,
दानवता पर नहीं शर्म है।
सुता चीखती दुखी मर्म है।
चौराहों पर विषय गर्म है।
है कहाँ जिंदा सत्य गान अब।
है कहाँ जिंदा ईमान अब।।
स्वरचित©®
अमिता,रवि दूबे
छत्तीसगढ़
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