Monday, January 20, 2020

उत्तराखंड से संदीप सिंधवाल की रचना- गणतंत्र दिवस

कवि - संदीप सिंधवाल
शीर्षक - गणतंत्र दिवस  (एक शहीद की आवाज)
राज्य - उत्तराखंड रुद्रप्रयाग 
संपर्क - +६७५७८२२७७६३



स्वराज के पथ पर कलेजों को सेका था।
उन आंखों ने भी आजाद भारत देखा था।।

मिली आजादी तो संविधान बना
लचीला आरक्षण धर्मनिपेक्ष बना
अपराध के सबक को कानून बना
जिंदगी के इंतजार का इंसाफ बना
अबूझ पहेली  है कि कोई सुभाष नेता था।
उन आंखों ने भी आजाद भारत देखा था।।

संविधान में सब एक गणतंत्र है
सियासत से बलशाली जनतंत्र है
विरोधाभास के लिए सब स्वतंत्र हैं
असलियत से परे कि अब राजतंत्र है
ऐसा भारत मिलेगा कतई  नहीं सोचा था।
उन आंखों ने भी आजाद भारत देखा था।।

मनाते सब संविधान का दिवस है
फैलता जुर्म और कानून विवश है
भ्रष्ट तंत्र तले हतास गरीब बेबस है
सियासी साजिशें,  बढ़ती हवस है।
इस दिन के लिए लहू से परतंत्रता को भेदा था?
उन आंखों ने भी आजाद भारत  देखा था।।

भारतीय हो कानून को मानना पड़ेगा
धर्म से पहले  देश को जानना पड़ेगा
असहाय प्रजा का हाथ थामना पड़ेगा
नई बुलंदियों को साथ  लांघना पड़ेगा
कुर्बान  हुआ वो भी इसी धरती  का बेटा था।
उन आंखों ने भी  आजाद  भारत देखा था।।

स्वराज  के पथ पर कलेजों को  सेका था।
उन आंखों ने भी आजाद भारत  देखा था।।

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