2.शिर्षक - "मन बैरी पच्छताय"
3.राज्य - छत्तीसगढ़(कोण्डागाँव)
4.सम्पर्क - 9691760900
"मन बैरी पच्छताय"
जियत रहतले ना पुछै कभु पेज-पसीया न चाय।
मरे मास ल नवा कपड़ा ओड़ाके गंगाजल पिलाय।।
ना कभु अस्पताल न कभु देवालय लेजाय।
जरे हाड़-मास के राख ल तिरथ कराय।।
देख जमाना के रीत ल मन बैरी पच्छताय।।
अपन लैका ल मारे ताना,कुकुर ला खांदगोड़ी चघाय।
आनिबानी के साबुन सेम्पो म कुकूर ल नह्वाय।।
दुध,बिस्कूट,बदाम कुकूर ला खवाय।
घर के लईका भुखे नरीयाय,जतन न करे महतारी कुपोषीत होईजाय।।
गाय-बच्छरु ल लौड़ी धर कुदाय।
दुध-दही बर लैकामन ललचाय।।
घर के कोठा(गौठान) म बैला न गाय।
कहाँ ले मिलही गोबर,घर-अँगना लिपाय।।
सुतउठ बिहनीया नदी-जंगल जाय।
मारे चिरई,रूखराई ल काटगिराय।।
अलकरहा होगे विकास जम्मो जिव मन ह रोगी होईजाय।
नदी-नहर होगे प्रदुषित,अऊ हवा घलोक नही सहाय।।
अपन के बहनी के चिंता करके लाजबचाय।
दुसर के ल मारे सिट्टी,छेड़े-गुर्राय।।
बालपन मा दाई,बहनी,फुफू संग मया जताय।
जवानी में सबला बिसरा के करे दुष्कर्म और जिंदा जलाय।।
देख जमाना के रीत ल मन बैरी पच्छताय।।
गिरिजा प्रसाद पाण्डे
कोण्डागाँव(बस्तर)
Super मित्र best हैं
ReplyDeleteNice sir ��
ReplyDeleteThank you jain ji
ReplyDeleteछत्तीगढ़ी का मान बढ़ा रहे आप
ReplyDeleteअच्छी रचना
धन्यवाद सर
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