Monday, November 25, 2019

महाराष्ट्र से संजय वासनिक की रचना- रेल और पेट

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:- “रेल और पेट”
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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“रेल और पेट”
रोज देखा करता था
उसे आते जाते 
चार चक्को  की
गुड़गुड़ी गाड़ी  पर बैठा
गंदा सा मैला कुचैला
रेल्वे के प्लेटर्फ़ोर्म पर
आते जाते राहगीरों को
घूरता रहता था...
कभी कभी अजीब हरकतें करता,
राहगीरो का ध्यान पाने के लिये,
मांगता था वो कभी कभी कुछ,
पेट की आग बुझाने के लिये,
प्लेटर्फ़ोर्म पर खड़ी रेलगाड़ी
के रिजर्वेशन के डिब्बे मे
बैठा था कोई शरीफ सा
दिखनेवाला आदमी
कुछ अलसाया सा
कुछ परेशान सा ...
उसी परेशानी के साथ
एक डिब्बा खोला उसने
कूछ खाने चीज़े होगी शायद 
आंखे बता रही थी उसकी...
जैसे ही  उठाकर निवाला
कड़वा सा मुंह बना लिया ..
थूक दिया तुरंत प्लेटर्फ़ोर्म पर
बिलकुल निचे एक सख़्ती के
जहाँ लिखा था
“स्वछ भारत मिशन”
उसी थुकी चीज को
उसने भी देखा,
उठी उसकी आँखोंमे
एक अजिबसी चमक
और पूरी ज़ोर से अपनी
चार चक्कोवाली
गुड़गुड़ी गाड़ी दौड़ाया
और एक ही पल मे
लपक लिया खिड़की से
बाहर थूकी हुयी
वो खाने की चीज़
अपनी मैली सी फटी पुरानी
कमिज से उसे  करके साफ
वो बड़ी खुशी से
गटक गया ....
पेट की आग पर
जैसे पाणी की करने बौछार ...
तभी रेल गाड़ी और
वह  रेंगने लगे...
अपने अपने गंतव्य की ओर ....
# संजय वासनिक ”वासु”

6 comments:

  1. ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रत्यक्ष दिख रहा है। कवि की कल्पना हृदय को झकझोर रहा है। एक कल्पना जो सच्चाई बयां कर रहा है।

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  2. सर ........खूपच वास्तव....सर आपल्या वे आँफ थिंकींगला सलाम .........

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  3. Bohot ache....Laga jaise akhondekha hal ho....

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  4. अत्यंत हृदयद्रावक...

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