Wednesday, November 20, 2019

छत्तीसगढ़ से गिरिजा प्रसाद पाण्डे की रचना- यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ


1.कवि का नाम - गिरिजा प्रसाद पाण्डे
2.शिर्षक - "यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ"
3.राज्य - छत्तीसगढ़(कोण्डागाँव)
4.सम्पर्क - 9691760900


    "यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ"
आया अस्तीत्व मेरा सन् दो हजार बारा में,
मैं सिचता मेरी सकल जमी को, नारंगी की निर्मल जलधारा से।
मैं बसता हूँ,गाँव,शहर,और पारा में।
नित नव निर्माण के गीत नये गाता हूँ,
यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ।।
मैं बनता हूँ,पाँच विकासखण्डों एवं पाँच तहसीलों से,
उड़ीसा की सिमा छुकर,घिरजाता हूँ पाँच जिलों से।
मैं बनता हूँ,नदी,पर्वत,पठार और गढ़धनोरा के टिलों से।
साल वनों का द्विप मैं,दण्डकारण्य क्षेत्र बनाता हूँ,
बनकर हरीयाली मैं खेतों पर लहलहाता हूँ।।
बांसशिल्प,घड़वाकला और एशिया का विशाल काष्टागार भी,
मैं जननी हूँ,विश्वविख्यात कलाकार की।
मैं परीणाम हूँ,सभी के अथक प्रयास की।
मैं नित नये किर्तिमान बनाता हूँ,
यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ।।
बस्तर रियासत काल में 18गढ़ो की राजधानी मै,
वीर-भुमि बलिदानों की कहानी मैं।
मैं माँ दन्तेश्वरी की पावन धरा बड़ेडोंगर की माटी हूँ,
बस्तर का प्रवेश द्वार,तेलीन शक्ति घाटी हूँ।
यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ।।
प्राचिन बौद्ध चैत्यगृह यहाँ भोंगापाल की,
नरसींहा-गोल्हादेव यहाँ देते हैं प्रमाण पाषाणिक काल की।
जहाँ निभाते हैं,रस्में गांयता,पटेल,मांझी-मुख्या,चालकी।
जिन्होने संजोये रखा है,हमारी संस्कृति आदिकाल की।
मैं ऐतिहासीक धरोहर बनजाता हूँ।।
कोख से मेरी पैदा होकर,खेल-कुद कर तैयार हुए,
हैं तैनात सिमा पर,तो कयी सिमा पार हुए।
कोई वैज्ञानिक,कलाकार तो कोई सुबेदार हुए।
इन सब बातों से मैं नही इतराता हूँ,
मैं तो सिर्फ अपनी दास्तां सुनाता हूँ।
"यूँ ही नही मैं कोण्डागाँव कहलाता हूँ"
          गिरिजा प्रसाद पाण्डे
           कोण्डागाँव(बस्तर)

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