Saturday, November 9, 2019

भोरहा के खोंधरा (भाग-१)- लेखक पुखराज यादव


            
          (दृश्य पहला- मंगलु का घर)
परछी मं मंगलु के दोनो बेटा, किशोर अऊ बजरंग दोनो झन मोबाईल मं पब-जी खेले बर झगरा होवत रिहिन। बेरा लगभग दिन के पातर हो लगे रहिस, अऊ संझाकुन के झलक अंगना मं दिखे लगत रिहिस। मंगलु के सुवारी गेंदाबाई ह परछी ला बाहरत-बाहरत् सोचते रहिस। अतेक बेरा होगे है फेर गुड्डू(किशोर) के पापा ह नइ आवत हे। छत्तीसगढ़िया मनखे मन के अतेक सीध रहिथे कि मन के बात फटले निकल तको जथे। उसने गेंदाबाई के अंतस के अव़ाज निकल पड़ीस-
- "ये गुड्डू के पापा, ल कईसन बेरा होगे दई.....! आन दिन तो ५ बजे ले पहली घर मं पहुच जाए फेर आज कति कोति ये मनखे हा बिलमगे।"
(कांहि सोचत-सोचत फेर किहिस)
-"अर्रे गुड्डू!!! काय करत हवव तुमन"
-"काहिं नइ दाई पब-जी खेलत हवन"(किशोर बोलिस)
-"दाई.. किशोर ल समझा दे, मोला मारथे अऊ कहिथे चल तै पढ़ कहिके अऊ मोला मोबाईल नइ देवय।"(बजरंग बीच मं बोलिस)
दोनो झन के कान ल पकड़ गेंदाबाई कहिस-
"कस रे टूरा हो? चार बजे के इस्कूल ले आये हव। अऊ बिगनसुल के मोबाईल मं झपाय परे हो।पढ़ई-लिखई के कोनो धियान नइ हे। अऊ जम्मो माथा के नाश करईया मोबाईल म दिन भर पब्जी- तो बबा जी करत रहिथो।"
"दाई-दाई....!!! कान पिरावत् हे वो छोड़ना।" (बजरंग बोलिस)
- "चलो तो तुमन जम्मो तुहर बेंदरा पसरा ला उठाव, अव बस्तर धर के आव अऊ कापी पुस्तक ल निकालव।" (तेज आव़ाज म गेंदा बाई बोलिस)
- "हव..दाई... हव...! अभिचे बइठत हवन, पढ़े बर।"
दोनो लईक सुट ले भितरी कोती जाय लगिन तब गेंदाबाई कहिस-
"किशोर...! तोर पापा कर वाट्सएप कर तो कतेक बेरा होगे फेर अभी ले तोर पापा ह नइ आवत हे।"
- "धर तोर मोबाईल ल, अभिचेच हमनला मोबाईल बर खख़वाये हस अऊ अब बड़ा वाट्सएप कर कहत हवस" (किशोर बोलिस)
किशोर, महतारी के हाथ मं मोबाईल धरा के कलेचुप भितरी कोती चल दिस। परछी मं मोबाईल ल धरे गेंदाबाई ह सोचत हे कईसे तो करथे कहिके बताये रहिस गुड्डू के पापा है। हां.. दई! हरियर वाट्सएप ल खोलबे तहान गुड्डू के पापा के फोटो ल छू के मैसेज लिखना हे कहिके बताये रिहिस..! उसने करथो। मोबाईल मं टाईपिंग म गेंदा बाई बीजी रिहिस अऊ मुहाटी ले मंगलु के घर मं परवेश होथे।
"काय करत हवस वो गुड्डू के मम्मी??"(मंगलू)
- " ४बजे के अवईया तेहा, मार लुड़हाडत मत आ...मोर एड़ी के रिस तरवा मं चढ़े हे।"(गेंदाबाई)
- "अर्रे...अर्रे... शांत रई, थोकिन जुड़ धरा अपन गुस्सा ला, अऊ ये मिठाई खा।" (हासत-हासत मंगलु कहिस)
- "काय बात के मिठाई..? तोर मालिक घर फेर काहीं होवत हे का।" (गेंदाबाई)
- "नइ बही...! ये हमर दिन बदले के मिठई हरे। लईका मन कहां हे बुला ओमन तलको... अर्रे...बजरंग..किशोर कहां हो दूनोझन"(मंगलु)
दोनो लईका दऊड़त-दऊड़त अपन बाबु करा पहुचिन। मिठाई के डब्बा ल देख के दोनो लईके का चेहरा मं खुशी के लहर छागे। बाबु के इसारा मिलत दोनो झंन एक-एक हाथ मं एक-एक लड्डू धरके खाय लगिन।किशोर ह पूछिस-
-" काय के मिठई हरे गा..?"
-"वाह रे टूरा नानकुन हवस अऊ सवाल बढ़े, चुपचाप मिठई खा अऊ पढ़े बर चल बईठ" (मंगलू)
दूनो लईका मन भितर कुरिया मं फेर चल दिन। ऐति बर गेंदा बाई के दिमाग मं सवाल चलत रहे काबर, गुड्डू के पापा ह मिठई लाने हे। कहिथे हमर दिन बदलईया है कहिके का बात हे। सोच के पूछिस-
"एजी, बताबे का होवईया हे? अऊ मिठई का बर लाने हवस"
- "काहिं नइ बही, बस ये समझ ले अब माटी के खोली के हमर दिन गए। निमान से अब तो महल बनाबो, जिहां तै रानी कस राज करबे। गाड़ी ले बो, मार सफेद रंग के... वो गौटिया घर के कार ले बड़े वाला....! सिरतोन मं भगवान जब देथे त छप्पर फाड़ के देथे कहिथे सही में। तोर बर नौ लखा ले लेबे....!!! अऊ...(मंगलु)
मंगलु के बात ल बीच काट के गेंदाबाई बोलिस-
" काहिं लॉटरी लग गे का...! तेमा अतेक कुदत हवस"
-" लॉटरी च लगे हे तईसने समझ।तै हा मोर मैना"(मंगलु)
- "देख जी बात काय हरे तेला सहीं बता, पईसा कौड़ी के मामला ह। हासी मजाक नइ होय। जोन करबे बने सोच समझ के करबे।" (गेंदाबाई)
- "वाह रे धोंधों अब्बड़ अक्कल आगे हे तोला। जब में कहत हव त भरोषा नइ होवत हे। लगथे ते मोर नमुसी करा देबे तईसे लगथे।जब हमन कार मं बुले बर निकलबो त।" (मंगलु)
- " बताबे काहीं मोला" (गेंदाबाई)
-"सून मोर मोबाईल नम्बर हल लाखों-करोड़ो झन में चुने गेहे। जेमा एक करोड़ के ईनाम दिही हमन ला। समझे...! ना जाना कहुचों हे न काहि नइ। सीधा हमर बैंक के खाता मं एक करोड़ रूपिया डालही कम्पनी वाला मन समझेस। मने सरकार भी जानही की में करोड़पति कईसे बनेव। जब सरकार ल तको पता चल जही त फेर कोन बात के डर बही। समझेस" (मंगलू)
- हां, ये बात रहे तभे तेहा अतेक कुदत हवस गा गुड्डू के पापा"(मुस्कुरावत गेंदाबाई बोलिस)
-"अऊ सुन...हमर देखमरहिन परोसिन ल काही झन कहिबे समझे नहीं तो... नज़र लग जही समझे।"(मंगलु)
-"ले गुड्डू के पापा तेहा बईठ मेहा चाय बनावत हँ।"(गेंदाबाई)
परछी मं बईठे-बईठे मंगलु सोचत रिहिस अतेक बेर होगे फेर कईसे एक करोड़ वाला मन के फोन नइ अवत हे। तभे मंगलु के मोबाईल मं फोन अईस।
-------------------------------------------------------------जारी----
लेखक
पुखराज यादव प्राज






महासमुन्द

2 comments:

  1. समाज हो रहे ठगी (लुट) से बचने हेतू एवं समाज में जागरूकता लाने का बेहतरीन प्रयास

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