नाम:- *डी कुमार--अजस्र(दुर्गेश मेघवाल)*
पता:- इंद्रा कॉलोनी बून्दी राजस्थान
मोबाइल नम्बर:-9461302199
पता:- इंद्रा कॉलोनी बून्दी राजस्थान
मोबाइल नम्बर:-9461302199
*स्वरचित रचना*
*कौन है तू …….*
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कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
भगवान मान मन्दिर में आठ याम तुझको पूजा ।
दिया खुदा का नाम दिन भर नमाज अदा की ।
शबद कीर्तन में सुबहो शाम तुझको याद किया ।
गिरजों के घण्टों ने न जाने कितनी बार तुझे पुकारा ।
प्रकृति ,ईश्वर ,खुदा ,भगवान ,गॉड
न जाने कितने नामोँ से तुझे पुकारें ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
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कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
भगवान मान मन्दिर में आठ याम तुझको पूजा ।
दिया खुदा का नाम दिन भर नमाज अदा की ।
शबद कीर्तन में सुबहो शाम तुझको याद किया ।
गिरजों के घण्टों ने न जाने कितनी बार तुझे पुकारा ।
प्रकृति ,ईश्वर ,खुदा ,भगवान ,गॉड
न जाने कितने नामोँ से तुझे पुकारें ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
पूजे दुनियां तुझे न जाने कितने ही कितने प्रकार ।
तू है कहीँ प्रत्यक्ष या
है तू वास्तव में केवल निराकार ।
केवल सोच में ही रहता है या
होगा भी तू कभी स्वप्न साकार ।
मंजिल के रूप में भी कभी मिलेगा या
है केवल रास्ता ही बनेगा पारावार ।
पर कौन है तू , कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
तू है कहीँ प्रत्यक्ष या
है तू वास्तव में केवल निराकार ।
केवल सोच में ही रहता है या
होगा भी तू कभी स्वप्न साकार ।
मंजिल के रूप में भी कभी मिलेगा या
है केवल रास्ता ही बनेगा पारावार ।
पर कौन है तू , कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
बल ,ताकत ,शक्ति ,चमत्कार, आश्चर्य सब है तुझमे ।
तेरी आलौकिक-पारलौकिक
कथाओं पर भी भरम नहीँ।
है तू साकार-निराकार
आकार-प्रकार में कई रूप भी ।
पर कोई तो ऐसा प्रमाण दे
कि कोई भरम न रहे जन के मन भी ।
कोन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
है इस लोक का या
ब्रह्माण्ड में कहीँ और है तेरा आशियाना ।
रहे तू कहीँ भी पर
पाना चाहे तुझे ही ये सारा जमाना ।
जीकर-मरकर भिन्न-भिन्न जतन
कर भी चाहे तुझको रिझाना ।
स्वर्ग मोक्ष जन्नत परमात्मा के रूप में
चाहे तुझको अपनाना ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
तेरी आलौकिक-पारलौकिक
कथाओं पर भी भरम नहीँ।
है तू साकार-निराकार
आकार-प्रकार में कई रूप भी ।
पर कोई तो ऐसा प्रमाण दे
कि कोई भरम न रहे जन के मन भी ।
कोन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
है इस लोक का या
ब्रह्माण्ड में कहीँ और है तेरा आशियाना ।
रहे तू कहीँ भी पर
पाना चाहे तुझे ही ये सारा जमाना ।
जीकर-मरकर भिन्न-भिन्न जतन
कर भी चाहे तुझको रिझाना ।
स्वर्ग मोक्ष जन्नत परमात्मा के रूप में
चाहे तुझको अपनाना ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
है तू अपना या
रिश्तों के भँवर में है तू सिर्फ पराया।
है तू किस रूप का
कौनसी मां ने तुझको आखिर है जाया ।
धुप भी तुझ पर पड़ती है या
है तू अंधकारों में भी बनता सिर्फ साया ।
काया का भी खेल है तेरा या
है केवल माया ही माया ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
रिश्तों के भँवर में है तू सिर्फ पराया।
है तू किस रूप का
कौनसी मां ने तुझको आखिर है जाया ।
धुप भी तुझ पर पड़ती है या
है तू अंधकारों में भी बनता सिर्फ साया ।
काया का भी खेल है तेरा या
है केवल माया ही माया ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
कला से मिलेगा या
विज्ञान के प्रयोगों से खोजूं तुझे ।
रास्ते है कितने ही कोई एक
रास्ता तो दिखला तू मुझे ।
मानव बना बुद्धिमानी के शिखर
पर बिठाया तूने मुझे ।
दी प्रगति इतनी परन्तु
तेरा ज्ञान न दिया अब तक मुझे ।
पर कौन है तू कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
विज्ञान के प्रयोगों से खोजूं तुझे ।
रास्ते है कितने ही कोई एक
रास्ता तो दिखला तू मुझे ।
मानव बना बुद्धिमानी के शिखर
पर बिठाया तूने मुझे ।
दी प्रगति इतनी परन्तु
तेरा ज्ञान न दिया अब तक मुझे ।
पर कौन है तू कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
मिथ्या-सत्य के संसार में कौनसा है
तेरा वास्तविक रूप ।
साकार निराकार के खेल में
कुछ तो बता तेरा प्रारूप ।
कुछ और नहीँ तो बस यह बतला दे
है तू किसके समरूप ।
कोई न कोई तो तेरा भी हो अक्ष
मन पर बने जो इस जगरूप ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
तेरा वास्तविक रूप ।
साकार निराकार के खेल में
कुछ तो बता तेरा प्रारूप ।
कुछ और नहीँ तो बस यह बतला दे
है तू किसके समरूप ।
कोई न कोई तो तेरा भी हो अक्ष
मन पर बने जो इस जगरूप ।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
भय ,वीरता ,भक्ति ,वात्सल्य, श्रृंगार
किसमें है श्वास तेरा ।
जीव-वनस्पति गोचर-अगोचर
किस-किसमें है वास तेरा ।
अवध, काबा ,यरुशलम कुछ तो बता
कहाँ निवास तेरा ।
कण कण में या इस जग के जन जन में
मैं बस मान लूँ विस्वास तेरा।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
✍✍ *D Kumar--अजस्र(दुर्गेश मेघवाल)*
किसमें है श्वास तेरा ।
जीव-वनस्पति गोचर-अगोचर
किस-किसमें है वास तेरा ।
अवध, काबा ,यरुशलम कुछ तो बता
कहाँ निवास तेरा ।
कण कण में या इस जग के जन जन में
मैं बस मान लूँ विस्वास तेरा।
पर कौन है तू ,कभी तो मुझसे भी मिल जरा ।
✍✍ *D Kumar--अजस्र(दुर्गेश मेघवाल)*

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