Monday, October 28, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि दिनेश कुमार विश्वकर्मा की रचना- मिट्टी का दीया


कवि: दिनेश कुमार विश्वकर्मा
राज्य: छत्तीसगढ़
शीर्षक: मिट्टी का दीया
सम्पर्क: 8463852536
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कभी बेवजह, बेवक़्त तो
यूँ जलता नहीं दीया,
ये बाती अगर बुझ भी गई
बदलता नहीं दीया।
पवित्र प्रार्थना करती युगों से
घाट पर नारियाँ,
नूर बरसा कर यूँ पानी में
चलता नहीं दीया।
मिल गया जो आग-पानी,
धूल के अस्तित्व से,
बिखरने से पहले माटी में
मिलता नहीं दीया।
चाक पर आकार देते
हाथों को कुछ मोल मिले,
हर युग जला; कलयुग में क्यूँ
सम्हलता नहीं दीया।
रंग बिरंगे, मोम स्वयं का
अक्स घटाते जाते,
पत्थर को देवता कर गया
बहलता नहीं दीया
देश की मिट्टी से
आती है शहादत की खुशबू,
विदेश के झालरों से कभी
मचलता नहीं दीया
इक शाम देखो तुम सूरज
कभी पर्वत, सागर से;
समझना रात दिवाली है
जब ढलता नहीं दीया
आ गए हैं फेसबुक पर
कई दीये जलते हुए,
आँगन में जो सुख दुःख बाँटे
छलता नहीं दीया
पल भर में पराये हो जाते
कुम्हार से बिछड़ कर,
अश्क सम्हाले बैठा है,पर
पिघलता नहीं दीया
दुनिया तकने लगी
रोशन हुए आसमान-ओ-ज़मीं,
दिवाली देश की शान, हमको
खलता नहीं दीया
कुम्हारों की मेहनत का
सम्मान गर न हो पाता,
तो किसी प्यारी रंगोली पर
खिलता नहीं दीया
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दिनेश कुमार विश्वकर्मा
छत्तीसगढ़

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