मेरा नाम: अपर्णा शर्मा "शिव संगीनी"
राज्य: गुजरात
विधा: कविता
*दशहरा*
देखो रावण दहन पर रावण हंस रहा है
कब तक तुम मुझे हर साल जलाओगे
मेरा पुतला बार-बार बनाओगे
आज नहीं है वो राम वो सीता वो लक्ष्मण
जिसकी कल्पना करके
तुम मेरा दहन कर रहे हो
लक्ष्मण जैसा भाई अब कहां
विभीषण जैसा भाई घर में बैठा यहाँ
राम सीता जैसा पवित्र प्यार कहां
सरूपनखा की नजर लगी है यहां
देखो रावण दहन पर रावण हंस रहा है
कहां है दशरथ पिता जैसा प्यार
कहां है सुमित्रा मां जैसा संसार
नजर लगी है आज मंथरा कैकयी की
खो गया है मां पिता का प्यार इस मतलबी संसार में
देखो रावण दहन पर रावण हंस रहा है
कहते थे राम राज्य है यहां
कुछ गलत नहीं होता है
एक धोबी के कहने पर सीता का त्याग किया
गर्भ में ही देखो अब बेटियों को मार दिया
देखो रावण दहन पर रावण हँस रहा है
उपज रही है नई-नई बुराइयां जमाने में
मैंने तो सीता को अशोक वाटिका में रखा था
सीता को कभी छुआ नहीं था
आज तो घरों में बच्चियाँ सुरक्षित नहीं है
बलातकार करके पापियों ने उनका गला घोटा था
देखो रावण दहन पर रामन हंस रहा है
कब तक तुम मुझे हर साल जलाओगे
देखो रावण दहन पर रावण हंस रहा है।।
Monday, October 7, 2019
गुजरात से कवयित्री अपर्णा शर्मा "शिव संगीनी" की रचना दशहरा
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