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प्रत्येक चरण में 16 मात्रा वाले छंद का प्रयोग
पहले लिखी कविता का संशोधित रूप
मात्रा भार
4 4 2 4 2
या
2 3 3 2 4 2
चरणान्त में गुरु(11,2)आता है।
तुक-दूसरे व चौथे चरण के अंत में मिलते हैं-
देव,दनुज,नाग,नर,चर-अचर,
नित मेरी महिमा गाते हैं।
सत्ता सर्वोच्च सदा मेरी,
सब सादर सीस झुकाते हैं।।1
सुर अनत शक्तिशाली जनप्रिय,
हूँ अजर,अमर,अविनाशी मैं।
अधिपति हूँ,तीनों लोकों का,
नित प्रवहमान एकदिशीय मैं।।2
मेरी प्रवाह जल धारा में,
जो गोते नित्य लगाते हैं।
केवल पुरुषार्थी,परिश्रमी,
जीवन-फल लाभ उठाते हैं।।3
श्रद्धा युत मेरी पूजन से,
अति शीघ्र रीझ जाता हूँ मैं।
फल चार मनुज जब पाते हैं,
बन आशुतोष जाता हूँ मैं।।4
हैं ऋद्धि-सिद्धि मेरी दासी,
नित हुकुम बजाया करतीं हैं।
रखते अपार मुझ पर निष्ठा,
उनका मंगल नित करतीं हैं।।5
स्वर्गस्थ सुरभि और कल्पतरु,
इच्छित देते हैं देवों को।
देते नत मेरी आज्ञा से
फल,कर्मशील के कर्मों को।।6
तुम,अष्टसिद्धि नवनिधियों का,
दाता मानव मुझको जानो।
साधक पाते फल पूज मुझे,
यह ब्रह्मगिरा अमृषा मानो।।7
हूँ रौद्ररूप भैरव मैं ही,
विकराल काल तांडव कर्ता।
डम डम डम डम डमरू बाजे
तब प्रखर कोप से जग जलता।।8
कृतकर्म भूल,हो कर्मविमुख,
नित विस्मृत जो सोये रहते।
त्रिनेत्र खुलते,ज्वाला से जल,
आजीवन हाथ वही मलते।।9
मैं न्यायाधीश अटल निश्चय,
समभाव न्याय सबका करता।
देता हूँ दंड निकम्मों को,
जो कर्महीन बैठा रहता।।10
जो मेरा रखते ध्यान नहीं,
करते रहते नित्य निरादर।
खर्राटे भर सोते रहते,
वे जीते पशुवत् जीवन भर।।11
अलसाये,कर्मविमुख जन ही,
किस्मत का रोना रोते हैं।
प्रतिकूल विधाता हो जाते,
जब कामचोर मुझे खोते हैं।।12
खोकर मुझको रोते हैं जन,
अवसर की फिर से चाह लिये।
पछताते हैं अकुलाते हैं,
क्यों तब हमनें यह नहीं किये??13
जब माया लिप्त अवज्ञा कर,
जन अवसर को भूल जाते हैं।
तब कुपित गरजते उग्र समय,
असफलता दे तड़पाते हैं।।14
10/04/2019
युगल किशोर पटेल
सहायक प्राध्यापक(हिन्दी)
शासकीय वीर सुरेंद्र साय महाविद्यालय गरियाबंद
(छत्तीसगढ़)
मोबाईल नम्बर-8839391868
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