भारतीय जनमानस में संचेतना का विकास करने वाले , समाज को नई दिशा देने के लिए प्रयोगात्मक जिंदगी जीने वाले महान व्यक्तित्व थे संत कबीर।आज के संतो के उपदेशों को लोग ये कहकर नकार देते हैं कि इनकी कथनी और करनी में साम्यता नहीं है। लेकिन संत कबीर अपने कथ्यों के प्रतिबिम्ब में स्वयं की छवि को सापेक्ष रखते थे।इसलिए उनकी रचनाएँ सर्वग्राह्य रही है और आज भी है।
तेरहवीं चौदहवीं शताब्दी का वह समय जब भारत विभिन्न संघर्षों से जूझ रहा था। अतिमहत्वकांक्षी लोग धार्मिक कट्टरता को हथियार बनाकर , लोगों को भावनात्मक संघर्ष में उलझाकर साम्राज्य स्थापित करने की दीर्घकालिक योजना बना रहे थे , विदेशी आक्रमणकारी यहाँ की अस्मिता और खजाना लुटने की कूट रच रहे थे तथा समाज वर्ण जाति वर्ग और धर्म के नाम पर अनेक रुढ़ियों और कुरीतियों से संघर्ष कर रहा था , तथा इनकी लत अनेक आडम्बरों को जन्म दे रही थी ऐसी गलाकाट परिस्थितियों के बीच धर्म ,जाति ,वर्ग, वर्ण की कट्टरता , आडंबर , अवांछित कर्मकाण्ड तथा दिखावेपन पर साहित्य रूपी शमशीर लेकर या स्वयं शमशीर बनकर प्रहार करके समाज को नई देने वाला तथा सद्भावना जगाने वाला नवजागरण के वाहक बनें संत कबीर।
अज्ञानता , गरीबी जैसी अनेक समस्याएं एवं धर्म , कर्म जाति , वर्ग तथा वर्ण में व्याप्त रुढ़ियां व आडम्बर रूपी बिहड़ बियाबान जंगल के बीच सुपथ का निर्माण करने वाले कर्मठ शिल्पी का पर्यायवाची है कबीर।उनका संपूर्ण जीवन विचार क्रांति का यज्ञ रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप अनेक विरोधी तथा अनेक प्रशंसक बने। उनके जीवन की उपलब्धि ये रही कि कबीर दास जी संत कवि दार्शनिक और उपदेशक के पद में शीर्ष पर जाकर स्वयं आज एक पंथ बन गए।
भौतिकता के प्रति आशक्त , पाश्चात्य संस्कृति की बीमारी तथा स्वार्थ लिप्तता से ग्रसित भारतीय समाज के कल्याण के लिए आज भी एक कबीर और उनके विचारों की निरपेक्ष व्याख्या की आवश्यकता है।
कबीर दास जी का प्रिय छंद है दोहा इसलिए उनके सम्मान में दो दोहा समर्पित है :-
मिलना मुश्किल है बड़ा , श्री कबीर सा संत।
स्वयं पंथ बन जो किया , गुमराहों का अंत।।
आओ हम सब भी बनें , चंदन सरिस अबीर।
पंथ दिखाने विश्व को , सच्चा संत कबीर।।
आलेख
विरेन्द्र कुमार साहू
ग्राम - बोडराबांधा (पाण्डुका)
वि.स. - राजिम जिला -गरियाबंद
छत्तीसगढ़ , मो. 9993690899
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