Wednesday, May 29, 2019

देवभोग की पीड़ा- written by गौरीशंकर कश्यप "सिरफिरा"

        देवभोग!! भारत की वह धरा जिसे स्वयं उस रचनाकार ने हीरों से सजा दिया और दुनिया की  बेशकीमती जगहों में से एक बना दिया,जहां विश्व का सबसे कीमती रत्न अलेक्जेंडर निकलता हो, हीरा और गार्नेट जैसे  रत्नों का जहां भंडार भरा हो, जिस धरा के भोग को स्वयं प्रभु श्री जगन्नाथ ने सर्व प्रथम स्वीकार किया, आज उसी देवभोग की स्थिति मानो उस भीलनी शबरी की तरह हो गी है जो ये विश्वास लिए कि श्री राम जी एक दिन आएंगे रोज राह में फूल सजाए उनका इंताजर करती, ठीक उसी प्रकार देवभोग के लोग भी यही अपेक्षा लिए जी रहे हैं कि कभी तो प्रभु श्री राम की तरह देवभोग का कष्ट मिटाने कोई महान आत्मा आएगी, और अब इंतजार का आलम यह है कि किसी एक शख्स के नजर में आस नजर आती है, तो किसी दूसरे के नजर में वो क्रोध में भी तब्दील हो गई है ।
       
                   मगर दुखड़ा रोएँ तो भी किसके पास रोएँ ? यहाँ का सुग्रीव भी तो बाली के विचार से प्रभावित हो गया है। हनुमान जी को ताकत याद दिलाने जामवंत प्रयास नहीं कर रहे, मानो क्षेत्र की दशा कुछ इस कदर हो गई है कि अब सरकार से विश्वास हटता ही जा रहा है ।
                  
       और हटे भी क्यो नहीं ? जिसे हम लोक कल्याण , क्षेत्र  के विकास के  लिए चुनते है, वो क्षेत्र के विकास को नजर अंदाज कर ,अपने कुछ तथाकथित लोगों का घर भरने लगे तो आक्रोश तो होगा ही, यही आक्रोश वर्तमान लोकसभा चुनाव में बहिष्कार के रूप में भी दिखा , अब शायद लोगों का लोकतंत्र से विश्वास हटता जा रहा है। और हटे भी क्यो नही, छत्तीसगढ़ राज्य के  अंतिम छोर में बसा यह क्षेत्र ना जाने कितनी सदियों से मूलभूत मांगों को लेकर लड़ता आ रहा है, मगर गूंगी बहरी अंधी सरकार को इनका पीड़ा आज तक नहीं दिखी। बस नेता उड़ते हुए आते उड़ते हुए चले जाते , उनको तो शायद ऊपर से ये जंगल किसी उपवन सा लगता होगा। 
       लगे भी क्यों ना साहब इतनी ऊंचाई में जो उड़ते हैं, इतनी ऊंचाई से कहाँ ये सड़क दिखती होगी ? ना उनको ये सड़क दिखती है ,ना सड़क पे होती मौतें । बिजली ने तो यहां की जान ही निकाल दी है साहब , लोग यहाँ कूलर फ्रिज नही खरीदते। अगर पूछो किसी से तो कहते है क्यों खरीदे साहब खरीद भी लिए तो किससे चलाएंगे लाइट तो जलती नही , कूलर कैसे चलाएं। गाँवों मे हर तीसरे घर में एक स्टेबलाइजर मिलेगा ,लोग अपनी पहली कमाई से राशन नही स्टेबलाइजर लाना पसंद कर रहे हैं , क्योंकि दो घण्टा ही सही घर की लाइट तो जल सके ,रात में वो उजाला देखने को तरसता है ,तो दिन में गर्मी हलाकान करती है। कोई भी दफ्तर जाओ तो बस चक्कर काटते रहो ,वो भी कहने लगते हैं कि लाइट नही है तो काम कैसे करें।
       अस्पताल में लोग इलाज कराने जाना छोड़ रहे हैं, बिना डॉ के इलाज भी कौन करे साहब । अस्पताल से ही डर लगने लगा है क्योंकि यहां इलाज कम रिफर ज्यादा होते हैं,और बीच रास्ते से ही मौत की खबर आने लगती है।
         सतयुग में तो सीता माता के पास लंका पहुचने के लिए वानरों ने समुद्र को ही बांध दिया था, पर अब आक्रोशित जनता वही टेक्निक अपनाने की कोशिश करती है ,तो पत्थर डूब जाते हैं, क्योंकि समस्या ये है कि पत्थर में लिखें तो किसका नाम लिखें, सब भ्रष्ट हैं किसी का भी नाम लिखते हैं तो वह पत्थर को तैरा नही पाते, अब भोली जनता करे तो क्या करे ।
        हां साहब एक बात और, वैज्ञानिक कहते हैं कि इन्सान बिना पानी पीये ज्यादा दिन नहीं जी सकता। मगर यहाँ आ के देखो साहब सब कुछ उल्टा है, यहां तो लोग पानी पीने के बाद ज्यादा दिन जी नहीं सकते |
        अब दर्द किसको सुनाएँ , दुखड़ा किसको बताएँ जिसे पूरी जनता ने आस लगा कर चुना है, वही बहरा लगता है जो कुछ विशेष लोगों के इशारे ही समझ सकते हैं, गलती उनकी भी नही है साहब क्योंकि  हम ही उनके कान इलाज करना नही जानते , शायद जिस दिन  यहां की जनता को  समय पर कान मरोड़ना आ जाएगा शायद उस दिन कोई समस्या ही नही होगी |

गौरीशंकर कश्यप "सिरफिरा"
गोहेकेला देवभोग (गरियाबन्द)
7272-01-8282
Gourikashyap123@gmail.com

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