Wednesday, May 29, 2019

गरमी- (Chhattisgarhi Poetry) by-कवि.कमलेश कौशिक

*कुहरत हे तन हा.जरत हे पसीना*।
*मुशकिल गुजरत हे.जेठ के महीना*।।

*किलिल कालल लइका करे*।
*बिजली बंद बिकट कुहरे*।।
   *सिलिंग फैन ल लु धरलिस*।
*अलकरहा गरमी वोहा उछरे।।*
*करिया परगे बिकट हसीना*
*कुहरत हे तन हा.जरत हे पसीना।।*

*खाना पिना होगे हराम।*
*थोरको तो नइ मिलत हे अराम।।*
*तीन दिन ले लइका ह परे हे।*
   *डाकटर घर के लाइन धरे हे।।*
*तड़फत जीव ला तेहा पिया दे।*
   *पानी मा घोर के पदीना।*
*कुहरत तन हा जरत हे पसीना।।*
*मुशकिल गुजरत हे जेठ के महीना*..

        *✍रचनाकार✍*
     *कवि.कमलेश कौशिक*
         *😃कठलहा 😃*

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