Wednesday, May 29, 2019

हमर गंवइ गांव- by Poet कवि.कमलेश कौशिक

इंहा खनखन घुंघरु बइला के।
अउ चले बियासी नागर रे।।
जुरमिल के कमाबोन हमन।
दु कांवरा खाबोन आगर के।।
    इंहा गुरतुर बोली पनिहारिन के।
    डोरी कस मया अटाथे रे।।
    अजी हमर मितानी पुरखा के।
     जियत भर ले खटाथे जी।।
इंहा मया पिरित के सुगघर भाखा।
    जुड़ पुरवाही छांव रे।।
सरग बरोबर लागे मोला।
हमर गंवई गांव रे।।
💐💐💐💐💐💐💐

गोरी के तरपंवरी सुगघर हे।
अऊ सुगघर बोली बैना हे।।
गजब महकथेफुलवारी हा।
चहकत कोयली मैना हे।।
    इंहा घाट घाट में बाट बाट में।
     जय जोहार हे बात बात में।।
    इंहा निरमल धारा महानदी के।
   जय जयकारा ऋषि मुनि के।।
जनम धरंव मै जब भी संगी।
इंहे हर जनम मेंआंव रे।।
सरग बरोबर लागे मोला।
हमर गंवई गांव रे।।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

इंहा लहसे अमरइया मे अमुवा।
अऊ कोयली परघावत हे।।
हमर पहटिया डीही डोंगर के।
सुगघर गीत ला गावत हे।।
   सकलावो जम्मो झन संगी।
   समरसता के बात करव।।
     मित मितान अउ सखा सियान।
सब मिलके ऐके पांत धरव।।
डोकरा बबा करिया मेछा।
ढे़रा डोरी कस अटियांव रे।।
सरग बरोबर लागे मोला।
हमर गंवई गांव रे।।
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼

     ✍रचनाकार✍
कवि.कमलेश कौशिक
  😃कठलहा 😄
Mo.  8827292703

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